ॐ जय शिव ओंकारा आरती: पूरे बोल, अर्थ और PDF
Key takeaways
- शिव जी की सबसे प्रचलित आरती 'ॐ जय शिव ओंकारा' है; अंतिम पंक्ति में इसके रचयिता के रूप में शिवानंद स्वामी का नाम आता है।
- आरती में ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को एक ही प्रणव (ॐ) के तीन रूप बताया गया है।
- सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर पूजा के अंत में यह आरती गाई जाती है।
- इस पेज को ब्राउज़र के Print → Save as PDF से मुफ़्त में PDF बनाया जा सकता है — किसी ऐप या डाउनलोड की ज़रूरत नहीं।
- महाकाल मंदिर उज्जैन की दैनिक आरतियाँ अलग परंपरा की हैं; घर पर यह लोक-प्रचलित आरती ही गाई जाती है।
अगर आप Shiv Ji Ki Aarti PDF ढूँढ रहे हैं, तो सबसे प्रचलित शिव आरती "ॐ जय शिव ओंकारा" के पूरे बोल नीचे दिए गए हैं। इस पेज को ब्राउज़र में Print दबाकर "Save as PDF" चुनें — मुफ़्त PDF तैयार। साथ में हर अंतरे का सरल अर्थ, आरती की सही विधि और इसे गाने के शुभ अवसर भी दिए गए हैं।
उत्तर भारत के लगभग हर घर और शिवालय में सोमवार की शाम यही आरती गूँजती है। इसकी भाषा सरल है, धुन आसान है और अर्थ गहरा — इसमें भगवान शिव को ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव तीनों रूपों में एक साथ देखा गया है। नीचे पहले पूरी आरती है, फिर उसका भावार्थ, फिर पूजा-विधि।
ॐ जय शिव ओंकारा — पूरी आरती (हिंदी बोल)
यह आरती लोक-परंपरा में अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े शब्द-भेद के साथ गाई जाती है। नीचे सबसे अधिक प्रचलित पाठ दिया गया है; शब्द-भेद की जानकारी आगे एक तालिका में है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
Shiv Ji Ki Aarti PDF कैसे बनाएँ (मुफ़्त, बिना ऐप)
बहुत-सी वेबसाइटें "PDF डाउनलोड" के नाम पर विज्ञापन, ऐप इंस्टॉल या अनजान फ़ाइलें देती हैं। इसकी ज़रूरत नहीं है। ऊपर दी गई आरती आपकी अपनी PDF बन सकती है:
| डिवाइस | तरीका | ध्यान दें |
|---|---|---|
| Android (Chrome) | ऊपर तीन बिंदु → Share → Print → "Save as PDF" चुनें | पेज साइज़ A4 रखें |
| iPhone (Safari) | Share बटन → Print → प्रीव्यू पर दो उँगलियों से ज़ूम → फिर Share → Save to Files | फ़ाइल "Files" ऐप में सेव होगी |
| कंप्यूटर (Windows/Mac) | Ctrl+P (Mac पर Cmd+P) → Destination में "Save as PDF" | "Headers and footers" बंद करें तो PDF साफ़ दिखेगी |
| प्रिंटर से काग़ज़ पर | वही Print विकल्प, प्रिंटर चुनें | पूजा घर के लिए मोटे काग़ज़ पर बड़े फ़ॉन्ट में प्रिंट करें |
बुज़ुर्गों के लिए प्रिंट करते समय ब्राउज़र में ज़ूम 125–150% करके प्रिंट करें, अक्षर बड़े आएँगे। अगर आप उज्जैन यात्रा की तैयारी कर रहे हैं, तो भस्म आरती, दर्शन, ड्रेस कोड और यात्रा-योजना एक जगह पढ़ने के लिए हमारी महाकाल भस्म आरती PDF गाइड देखें — ध्यान रहे, वह यात्रा-गाइड है, आरती-संग्रह नहीं।
हर अंतरे का सरल अर्थ
आरती गाते समय अर्थ मन में रहे तो भाव अपने-आप गहरा हो जाता है। नीचे हर अंतरे का संक्षिप्त भावार्थ है।
| अंतरा (पहली पंक्ति) | सरल भावार्थ |
|---|---|
| ॐ जय शिव ओंकारा | ओंकार-स्वरूप शिव की जय; ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव — तीनों आप ही हैं, और पार्वती आपकी अर्द्धांगिनी हैं। |
| एकानन चतुरानन पंचानन राजे | एक मुख वाले विष्णु, चार मुख वाले ब्रह्मा और पाँच मुख वाले शिव; हंस, गरुड़ और बैल (नंदी) उनके वाहन। |
| दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज | दो, चार और दस भुजाओं वाले रूप; तीनों गुणों वाला यह रूप तीनों लोकों को मोहित करता है। |
| अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला | रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुण्डमाला धारण करने वाले; माथे पर चंदन-कस्तूरी और चंद्रमा। |
| श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर | सफ़ेद, पीले और बाघ-चर्म वस्त्र; सनक आदि ऋषि, गरुड़ आदि और भूत-गण सदा साथ। |
| कर के मध्य कमण्डलु | हाथों में कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल; सुख देने वाले, दुख हरने वाले, जगत के पालक। |
| ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका | अज्ञानी इन्हें अलग मानते हैं, पर प्रणव (ॐ) में ये तीनों एक ही हैं। |
| लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा | लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती साथ; पार्वती अर्द्धांगिनी और गंगा शिव की जटा की लहर। |
| पर्वत सोहैं पार्वती | पार्वती पर्वतराज की पुत्री, शंकर का निवास कैलास; भांग-धतूरा भोजन, भस्म में वास। |
| जटा में गंग बहत है | जटाओं में गंगा, गले में मुण्डमाला, शेषनाग लिपटे हुए और मृगछाला का ओढ़ना। |
| काशी में विराजे विश्वनाथ | काशी में विश्वनाथ रूप में विराजमान, नंदी द्वारपाल; रोज़ दर्शन करने की महिमा अपार। |
| त्रिगुणस्वामी जी की आरती | जो भी यह आरती गाए, शिवानंद स्वामी कहते हैं, उसकी मनोकामना पूरी होती है। |
शिव आरती की सही विधि (घर पर)
आरती पूजा का समापन है, शुरुआत नहीं। इसलिए पहले संक्षिप्त पूजा करें, फिर आरती:
- स्नान और शुद्धि: स्वच्छ वस्त्र पहनें, पूजा-स्थल साफ़ करें।
- अभिषेक: शिवलिंग या शिव-चित्र के सामने जल अर्पित करें; सामर्थ्य हो तो दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें।
- अर्पण: बेलपत्र (तीन पत्तियों वाला, बिना कटा-फटा), सफ़ेद फूल, अक्षत और चंदन चढ़ाएँ।
- दीप और धूप: घी का दीपक जलाएँ; आरती की थाली में कपूर भी रखें।
- आरती: थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाते हुए "ॐ जय शिव ओंकारा" गाएँ। परंपरा में शिव-आरती के बाद शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है — जलाधारी (जल निकलने की नाली) को लाँघा नहीं जाता।
- समापन: आरती के बाद "कर्पूरगौरं करुणावतारं" मंत्र बोलें, सब पर आरती की लौ से आशीर्वाद लें और प्रसाद बाँटें।
कब गाएँ शिव जी की आरती
| अवसर | क्यों विशेष | व्यावहारिक सुझाव |
|---|---|---|
| हर सोमवार | सोमवार शिव-पूजन का दिन माना जाता है | शाम को दीपक जलाकर परिवार के साथ |
| प्रदोष व्रत | त्रयोदशी की संध्या (प्रदोष काल) शिव-पूजा का विशेष समय | सूर्यास्त के आसपास पूजा के बाद आरती |
| सावन का महीना | पूरा श्रावण मास शिव को समर्पित | रोज़ सुबह-शाम, सावन सोमवार पर विशेष |
| महाशिवरात्रि | शिव-पार्वती विवाह और शिव-तत्व की रात्रि | रात के चार प्रहरों की पूजा के अंत में |
| रोज़ की संध्या | नियमित भक्ति के लिए | 5 मिनट की छोटी पूजा भी पर्याप्त |
आरती करते समय होने वाली आम गलतियाँ
आरती में भाव सबसे ऊपर है, फिर भी कुछ छोटी बातें ध्यान में रहें तो पूजा अधिक व्यवस्थित होती है:
- बिना पूजा सीधे आरती: आरती पूजा का समापन है। कम से कम जल, एक बेलपत्र और दीपक अर्पित करने के बाद ही आरती करें।
- शिवलिंग पर तुलसी और हल्दी: परंपरा में शिवलिंग पर तुलसी-दल, हल्दी और केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता। शिव के लिए बेलपत्र, धतूरा, आक और सफ़ेद फूल प्रिय माने जाते हैं।
- टूटा या कटा बेलपत्र: तीन पत्तियों वाला साबुत बेलपत्र चढ़ाएँ, चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रखें।
- जल्दबाज़ी में गाना: हर अंतरे के बाद "ॐ जय शिव ओंकारा" की टेक सब मिलकर दोहराएँ; लय धीमी और स्पष्ट रखें।
- कपूर की लौ से असावधानी: बच्चों के हाथ में थाली दें तो पास खड़े रहें और दुपट्टा/आँचल लौ से दूर रखें।
बच्चों को यह आरती कैसे सिखाएँ
पहले सप्ताह केवल पहला अंतरा और टेक सिखाएँ। हर सोमवार एक नया अंतरा जोड़ें — बारह अंतरे लगभग तीन महीने में सहज याद हो जाते हैं। प्रिंट की हुई आरती पूजा-घर में बच्चों की आँख की ऊँचाई पर लगाएँ और हर अंतरे के अर्थ वाली तालिका से एक-एक चित्र-कथा सुनाएँ — जैसे गंगा जटा में क्यों हैं, या नंदी काशी में द्वार पर क्यों बैठे हैं। अर्थ समझ में आने पर बच्चे आरती को रटते नहीं, महसूस करते हैं।
प्रचलित शब्द-भेद
लोक-परंपरा में यह आरती सदियों से मौखिक रूप से चली आई है, इसलिए कई घरों में कुछ शब्द अलग सुनाई देते हैं। दोनों ही रूप श्रद्धा से गाए जाते हैं — कोई "गलत" नहीं है:
- "त्रिगुण रूप निरखते" — कहीं "त्रिगुण रूप निरखत"।
- "चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी" — कुछ पुस्तकों में इसकी जगह "त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी" मिलता है।
- "भांग धतूर का भोजन" — कहीं "भांग धतूरे का भोजन"।
- "कहत शिवानंद स्वामी" — कहीं "कहत शिवानंद स्वामी सुखसंपति पावे"।
यह आरती "ॐ जय जगदीश हरे" की धुन और छंद से मिलती-जुलती है, इसीलिए बहुत से लोग दोनों को एक ही लय में गाते हैं। आरती परंपरा के बारे में सामान्य जानकारी के लिए Wikipedia पर Aarti पढ़ सकते हैं।
महाकाल मंदिर की आरती और घर की आरती में अंतर
उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग में दिन भर कई आरतियाँ होती हैं — तड़के की भस्म आरती से लेकर रात की शयन आरती तक। मंदिर में ये आरतियाँ पुजारियों द्वारा विशेष विधि, मंत्रों और वाद्यों के साथ की जाती हैं; "ॐ जय शिव ओंकारा" मूलतः घरों और सामान्य शिवालयों में गाई जाने वाली लोक-प्रचलित आरती है। महाकाल की सभी दैनिक आरतियों का समय जानने के लिए हमारा लेख महाकाल की कितनी आरती होती है पढ़ें, और आरती के बाद क्या चढ़ाएँ-क्या प्रसाद लें, यह महाकाल प्रसाद और भोग में बताया गया है।
घर पर शिव आरती करने वालों के लिए एक सुझाव: आरती से पहले एक बार "ॐ नमः शिवाय" का 11 या 108 बार जप करें। मन स्थिर होगा और आरती केवल गाना न रहकर ध्यान बन जाएगी। जो लोग शिव चालीसा का पाठ करते हैं, वे पहले चालीसा पढ़ें और अंत में यही आरती गाएँ — यह क्रम ज़्यादातर घरों में प्रचलित है।
Frequently asked questions
शिव जी की आरती का PDF कैसे डाउनलोड करें?
इस पेज को खोलकर ब्राउज़र में Print (कंप्यूटर पर Ctrl+P) चुनें और Destination में 'Save as PDF' सेट करें। मोबाइल पर Share → Print → Save as PDF से भी यही होता है। किसी ऐप या अनजान डाउनलोड की ज़रूरत नहीं।
ॐ जय शिव ओंकारा आरती किसने लिखी?
आरती की अंतिम पंक्ति 'कहत शिवानंद स्वामी' में रचयिता के रूप में शिवानंद स्वामी का नाम आता है। यह आरती लोक-परंपरा में पीढ़ियों से गाई जा रही है।
शिव आरती किस दिन और किस समय करनी चाहिए?
रोज़ सुबह या संध्या पूजा के अंत में आरती की जा सकती है। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
शिव आरती में कितनी बार थाली घुमानी चाहिए?
लोक-परंपरा में आरती की थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाया जाता है; कई घरों में चरणों पर चार बार, नाभि पर दो बार, मुख पर एक बार और पूरे विग्रह पर सात बार घुमाने की रीति है। अपने कुल की परंपरा का पालन करें।
क्या शिव आरती के बाद शिवलिंग की पूरी परिक्रमा करते हैं?
परंपरा में शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है और जलाधारी को लाँघा नहीं जाता। इसके बाद उसी रास्ते वापस लौटते हैं।
भस्म आरती बुकिंग में सहायता चाहिए?
संपर्क करेंWritten and reviewed by the Bhasma Aarti editorial team. Facts checked against primary sources; see the reference above.