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शिव चालीसा आरती सहित: पूरा पाठ, अर्थ और विधि

BA By Bhasma Aarti Editorial· Updated 2026-09-27·7 min read

Key takeaways

Shiv chalisa aarti sahit पढ़ने का प्रचलित क्रम है — पहले शिव चालीसा के दोहे और 40 चौपाइयाँ, फिर "ॐ जय शिव ओंकारा" आरती। नीचे दोनों का पूरा पाठ एक साथ दिया गया है, साथ में पाठ की विधि, भावार्थ की तालिका और कब पढ़ें। पूरा क्रम लगभग 15 मिनट में हो जाता है।

शिव चालीसा "जय गिरिजा पति दीन दयाला" से शुरू होती है और सरल अवधी-हिंदी में भगवान शिव के रूप, उनकी लीलाओं और भक्तों पर कृपा का वर्णन करती है। इसके अंतिम दोहे में रचना-काल और रचयिता अयोध्यादास का उल्लेख आता है। यह पाठ बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक, हर कोई आसानी से कर सकता है।

अगर आप यह पाठ उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की यात्रा से पहले कर रहे हैं, तो मंदिर की आरतियाँ, भस्म आरती बुकिंग, ड्रेस कोड और यात्रा-क्रम एक जगह समझने के लिए हमारी महाकाल भस्म आरती PDF गाइड उपयोगी रहेगी। चालीसा और आरती का पूरा पाठ आपको इसी पेज पर मुफ़्त मिलेगा।

शिव चालीसा — पूरा पाठ

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

शिव जी की आरती — ॐ जय शिव ओंकारा

चालीसा के तुरंत बाद दीपक और कपूर जलाकर यह आरती गाएँ:

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका। प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा। पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा। भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला। शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी। नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥

आरती के बाद "कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥" मंत्र बोलकर क्षमा-प्रार्थना करें।

Shiv Chalisa Aarti Sahit पढ़ने की विधि

क्रमक्या करेंलगभग समय
1. तैयारीस्नान, स्वच्छ वस्त्र; पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके आसन पर बैठें5 मिनट
2. संकल्प और गणेश-स्मरणहाथ में जल लेकर मन में उद्देश्य बोलें; चालीसा का पहला दोहा भी गणेश-वंदना ही है1 मिनट
3. अभिषेक और अर्पणशिवलिंग/चित्र पर जल, सामर्थ्य हो तो पंचामृत; बेलपत्र, सफ़ेद फूल, अक्षत, चंदन5 मिनट
4. दीप-धूपघी का दीपक और धूप जलाएँ1 मिनट
5. शिव चालीसा पाठस्पष्ट उच्चारण के साथ, मध्यम गति से8–12 मिनट
6. आरतीकपूर जलाकर "ॐ जय शिव ओंकारा"3–4 मिनट
7. समापनकर्पूरगौरं मंत्र, क्षमा-प्रार्थना, आधी परिक्रमा, प्रसाद2 मिनट

शिव चालीसा का भावार्थ — खंड अनुसार

चालीसा को पाँच हिस्सों में समझें तो पाठ करते समय मन भटकता नहीं:

खंडचौपाइयाँ (लगभग)विषय
1. रूप-वर्णन1–8माथे पर चंद्रमा, जटा में गंगा, गले में मुण्डमाल, बाघम्बर, वाम अंग में पार्वती, हाथ में त्रिशूल, साथ में नंदी, गणेश और कार्तिकेय
2. देवताओं की रक्षा9–13तारकासुर वध के लिए षडानन (कार्तिकेय) को भेजना, जलंधर और त्रिपुरासुर का संहार
3. कृपा की कथाएँ14–22भगीरथ की तपस्या, समुद्र मंथन का विष पीकर नीलकण्ठ कहलाना, रामचंद्र द्वारा पूजन और सहस्र कमल की परीक्षा
4. भक्त की पुकार23–30संकट में "त्राहि त्राहि" — जब परिवार भी साथ न दे, तब शिव ही आश्रय
5. फलश्रुति31–40 और अंतिम दोहेपाठ का फल, त्रयोदशी व्रत और होम का उल्लेख, रचयिता अयोध्यादास की प्रार्थना

चालीसा में आई कथाएँ — संक्षेप में

चालीसा की चौपाइयाँ छोटी हैं, पर हर एक के पीछे एक पूरी पौराणिक कथा है। इन्हें जानकर पाठ करें तो हर पंक्ति एक दृश्य बन जाती है।

तारकासुर और षडानन

तारकासुर को वरदान था कि उसे केवल शिव-पुत्र ही मार सकता है। देवताओं की पुकार पर शिव ने षडानन (छह मुख वाले कार्तिकेय) को भेजा, जिन्होंने "लवनिमेष" — पलक झपकते — असुर का अंत किया।

समुद्र मंथन और नीलकण्ठ

समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष की ज्वाला से देवता और असुर दोनों व्याकुल हो गए। शिव ने विष को कंठ में रोक लिया, कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकण्ठ कहलाए। चालीसा की "कीन्ही दया तहं करी सहाई" पंक्ति इसी करुणा की याद है।

सहस्र कमल की परीक्षा

कथा के अनुसार शिव-पूजन के लिए एक हज़ार कमल अर्पित करते समय एक कमल कम पड़ गया। तब "कमल नयन" कहलाने वाले भक्त (कुछ व्याख्याओं में श्रीराम, कुछ में विष्णु) ने अपना नेत्र अर्पित करने का निश्चय किया — यह कठिन भक्ति देखकर शिव प्रसन्न हुए और इच्छित वर दिया।

भगीरथ की तपस्या

भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने का तप किया। गंगा के वेग को संभालने के लिए शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया — इसीलिए चालीसा और आरती दोनों में "शिर गंग बहाये" और "जटा में गंग" का वर्णन आता है।

कब पढ़ें शिव चालीसा

पाठ के नियम और व्यावहारिक सुझाव

शिव चालीसा के लिए कोई कठोर नियम नहीं है — भाव और नियमितता सबसे ज़रूरी हैं। फिर भी ये बातें उपयोगी हैं:

  1. उच्चारण: "षडानन", "त्रिपुरासुर", "नीलकण्ठ" जैसे शब्द धीरे बोलें। शुरुआत में पढ़कर, बाद में याद से।
  2. संख्या: सामान्य दिनों में 1 पाठ पर्याप्त है; विशेष संकल्प में 11 या 108 पाठ की परंपरा भी है।
  3. शिवलिंग पर क्या न चढ़ाएँ: परंपरा में तुलसी-दल, हल्दी और केतकी का फूल शिवलिंग पर नहीं चढ़ाए जाते।
  4. बेलपत्र: तीन पत्तियों वाला साबुत बेलपत्र, चिकनी सतह शिवलिंग की ओर।
  5. रुद्राक्ष माला: जप के लिए रुद्राक्ष की माला प्रयोग करें तो "ॐ नमः शिवाय" का जप चालीसा से पहले 108 बार करें।
  6. मंदिर में पाठ: भीड़ वाले मंदिरों में ऊँची आवाज़ में पाठ करने से बचें, दूसरों की पूजा में बाधा न हो।

महाकाल के दर्शन को जाएँ तो मंदिर में क्या चढ़ाएँ और प्रसाद कहाँ से लें, यह हमने महाकाल प्रसाद और भोग में विस्तार से बताया है। मंदिर की दैनिक आरतियों का समय महाकाल की कितनी आरती होती है में है।

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Frequently asked questions

शिव चालीसा में कितनी चौपाइयाँ होती हैं?

शिव चालीसा में आरंभिक दोहे के बाद 40 चौपाइयाँ और अंत में दो दोहे होते हैं। 'चालीसा' नाम इन्हीं 40 चौपाइयों से आया है।

शिव चालीसा और आरती किस क्रम में पढ़ें?

पहले संक्षिप्त पूजा (जल, बेलपत्र, दीपक), फिर शिव चालीसा का पाठ, उसके बाद 'ॐ जय शिव ओंकारा' आरती और अंत में कर्पूरगौरं मंत्र के साथ क्षमा-प्रार्थना।

शिव चालीसा किसने लिखी?

चालीसा के पहले दोहे और अंतिम चौपाई में 'अयोध्यादास' का नाम आता है, जिन्हें इसका रचयिता माना जाता है।

क्या महिलाएँ शिव चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ, शिव चालीसा का पाठ कोई भी श्रद्धालु — स्त्री, पुरुष, बच्चे या बुज़ुर्ग — कर सकता है। भाव और नियमितता सबसे महत्वपूर्ण हैं।

शिव चालीसा पढ़ने में कितना समय लगता है?

सामान्य गति से पूरा पाठ लगभग 8 से 12 मिनट में हो जाता है, और आरती सहित पूरा क्रम लगभग 15 मिनट का होता है।

शिव चालीसा का पाठ किस दिन करना सबसे अच्छा है?

रोज़ सुबह पाठ किया जा सकता है; सोमवार, प्रदोष (त्रयोदशी), सावन और महाशिवरात्रि पर इसका विशेष महत्व माना जाता है।

Authoritative referenceMahakaleshwar Bhasma Aarti (official) ↗

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Written and reviewed by the Bhasma Aarti editorial team. Facts checked against primary sources; see the reference above.

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